पहले वे आँकड़े जो हमें यहाँ लाए
त्रिशा फाउंडेशन स्थापना के चरण में है, इसलिए इस पृष्ठ पर हमारी अपनी कोई उपलब्धि का दावा नहीं है। यहाँ वे सार्वजनिक आँकड़े हैं जिन पर हमारा काम खड़ा है, और नीचे यह कि हम अपने काम को किन संख्याओं से नापेंगे।
दो करोड़ वयस्क, और उनमें सवा करोड़ महिलाएँ
बिहार की साक्षरता दर देश में सबसे नीची दरों में से एक है, और पुरुष-महिला का अंतर उससे भी बड़ी कहानी कहता है।
यही आँकड़े तालिका में देखें
| वर्ग | प्रतिशत |
|---|---|
| कुल साक्षरता | 74.3% |
| महिला साक्षरता | 66.1% |
स्रोत: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023–24. अनुमानित 2 करोड़ वयस्क (15–59 वर्ष) निरक्षर, जिनमें लगभग 1.32 करोड़ महिलाएँ।
जैसे-जैसे कक्षा ऊपर जाती है, बच्चे छूटते जाते हैं
प्राथमिक से माध्यमिक तक सकल नामांकन अनुपात लगातार गिरता है। यह सिर्फ़ इच्छा का सवाल नहीं है — बिहार के केवल 2% स्कूलों में माध्यमिक कक्षाएँ हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 9.8% है।
सकल नामांकन अनुपात (GER)
स्कूल छोड़ने की दर
यही आँकड़े तालिका में देखें
| स्तर | GER | छोड़ने की दर |
|---|---|---|
| प्राथमिक | 83.4% | 8.9% |
| उच्च प्राथमिक | 68.4% | 25.9% |
| माध्यमिक | 45.6% | 25.6% |
| उच्चतर माध्यमिक | 30.0% | – |
स्रोत: यूडाइस+ (UDISE+) 2023–24, बिहार.
‘चालू शौचालय’ और ‘इस्तेमाल लायक़ शौचालय’ एक चीज़ नहीं हैं
स्रोत: यूडाइस+ (UDISE+) 2023–24, बिहार.
हर दो में से लगभग एक घर
बिहार के लगभग आधे घरों में कोई न कोई सदस्य काम के लिए बाहर गया है। इसीलिए हमारे हुनर कार्यक्रम की सफलता प्रमाण-पत्रों से नहीं, इस बात से नापी जाती है कि कितने लोग घर के पास कमाने लगे।
स्रोत: आईआईपीएस, बिहार पलायन अध्ययन. राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2023 के अनुसार केवल 48.9% युवा रोज़गार-योग्य आँके गए।
हक़ स्क्रीन पर चला गया, लोग पीछे छूट गए
राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, डीबीटी, ई-श्रम — बिहार में लगभग हर हक़ अब किसी न किसी पोर्टल से होकर गुज़रता है। जो व्यक्ति स्क्रीन नहीं चला पाता, उसके लिए यह सुविधा नहीं, एक और दीवार है।
और यह दीवार अब अकेली खड़ी है: ग्रामीण डिजिटल साक्षरता का राष्ट्रीय कार्यक्रम बंद हो चुका है, और गाँव के स्तर पर उसकी जगह कुछ नहीं आया।
हम अपने काम को किन संख्याओं से नापेंगे
कोई संस्था जो अभी शुरू हो रही है, उसके पास दिखाने को उपलब्धि नहीं होती — लेकिन यह तय होना चाहिए कि आगे चलकर उसे किन आँकड़ों पर परखा जाए। ये रहे वे आँकड़े। हम इन्हें हर तिमाही सार्वजनिक करेंगे।
शुरुआत में साथ देने वाले ही तय करते हैं कि संस्था क्या बनेगी
त्रिशा फाउंडेशन अभी अपनी पहली पंचायत का कार्यक्रम खड़ा कर रहा है। पढ़ाना, सर्वेक्षण, सीएसआर साझेदारी या ज़िला स्तर पर तालमेल — जिस भी रूप में आप जुड़ सकें, हमें लिखिए।